(पंजाब दैनिक न्यूज़)  दिल्ली से लेकर देहरादून तक मुख्यमंत्री की रेस में तीरथ सिंह रावत का नाम कहीं भी दूर-दूर तक नहीं था.महज़ 48 घंटे के दौरान उत्तराखंड में राजनीतिक घटनाक्रम काफ़ी तेज़ी से बदला.त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया और नए मुख्यमंत्री के नाम का एलान भी हो गया. इन सब के बीच मुख्यमंत्री पद की रेस में जो नाम शायद सबसे आगे चल रहे थे, वो अचानक पीछे रह गए और एक नया नाम आया तीरथ सिंह रावत का.तीरथ सिंह रावत संघ पृष्ठभूमि से आते हैं. साथ ही उत्तराखंड में जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधना बहुत महत्वपूर्ण है.

यहाँ राजपूत वोटरों की बड़ी आबादी है. माना जाता है कि यहाँ राजपूत वोटरों की संख्या ब्राह्मण वोटरों से अधिक है.नौ नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड नया राज्य बना. तब उत्तर प्रदेश विधान परिषद में उत्तराखंड के रहने वाले जो सदस्य थे उन्हें यहाँ की अंतरिम सरकार में विधायक मान लिया गया था. उस समय भगत सिंह कोश्यारी, तीरथ सिंह रावत, नित्यानंद स्वामी और इंदिरा हृदयेश सरीखे बड़े नेता यूपी विधान परिषद में उत्तारखंड से आने वाले सदस्य थे. इन्हें उत्तराखंड में विधायक मान लिया गया था.

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नित्यानंद स्वामी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने फिर उसके कुछ दिनों बाद भगत सिंह कोश्यारी मुख्यमंत्री बने जिनकी अंतरिम सरकार में तीरथ सिंह रावत शिक्षा राज्य मंत्री रहे.इसके बाद 2007 में भारतीय जनता पार्टी उत्तराखंड के प्रदेश महामंत्री चुने गए. 2012 में बीजेपी की टिकट पर चौबट्टाखाल से विधायक बने.

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