जालंधर (मुनीश तोखी ) महिलाओं के प्रति विकृत मानव सोच में बदलाव ही समाज में लिंग समानता की कुंजी है। इस सिद्धांन्त को मद्देनजर रखते हुए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा चलाए जा रहे   विभिन्न परिकल्पों में सन्तुलन के अन्तर्गत मौके पर मौजूदा जनसमूह को महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराधों के विभिन्न आयामों पर साध्वी उर्मिला भारती जी और रने भारती जी ने जागरूक किया।उन्होंने कहा कि मनुष्य की निर्मात्री नारी ही है। यदि मनुष्य जाति उन्नति चाहती है तो पहले नारी को शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण और सुबिकसित बनाना होगा। तभी मनुष्यों में सबलता, सक्षमता, सद्बुद्धि, सदगुण और महानता के संस्कारों का उदय हो सकता है। नारी को पिछड़ा हुआ रखना अपने पैरों में आप कुल्हाड़ी मारना है। साध्वी जी ने बताया कि भारत देश में नारी ने हमेशा ही प्रथम स्थान प्राप्त किया है। बल, ज्ञान और विजय की देवी में केवल नारी को ही देवियों के रूप में माना गया है। आदिकाल से ही हमारे देश में नारी पूजा होती आ रही है, यहां अर्धनारीश्वर का आदर्श रहा है अर्थात पुरष का आधा हिस्सा नारी है क्योकि अकेला पुरष समाज को नहीं चला सकता। इसीलिए नारी का होना अति जरूरी है और नारी माँ केरूप में हमें संसार का दर्शन करवाती है। इसके शुभ आर्शीवाद केसाथ हम विजय प्राप्त करते है। साध्वी बलजीत भारती जी ने बताया कि माँ ही प्रेम भक्ति, श्रद्धा की देवी है। तीनों लोकों में नारी पूजा की जाती है। आज भी जीवन के अन्दर विद्या बल और धन की प्राप्ति के लिए तीन देवियां भाव सरस्वती, लक्ष्मी औद दुर्गा की पूजा से आर्शीवाद प्राप्त किया जाता है। जहां नारी का सन्मान होता है वहां देवतों का वास होता है। जहां नारी का सन्मान नहीं होता वहां किए गएकोई भी पुन्य कर्म, यज्ञ आदि व्यर्थ है। साध्वी जी ने महिलाओं का संबोधित करते हुए कहा कि आज प्रत्येक नारी को जागरूक होना पड़ेगा। उसे भीतर छिपी हुई प्रतिभाओं से अवगत होना पड़ेगा। एक नारी चाहे तो बहुत कुछ कर सकती हैं। वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों कासामना स्वंय कर सकती है। बस आज ज़रूरत है नारी सशक्तिकरण की। सशक्तिकरण का अर्थ है स्वंय की शक्तियों का बोध हो जाना जो कि अध्यात्म द्वारा ही संभव है। इस अवसर पर कुछ खेले और कारियोग्राफ का भी आयोजन किया गया । जिसमें यह संदेश था कि औरत किसी से कम नही है ।

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