जालंधर (मुनीश तोखी ) श्री आशुतोष महाराज जी का मत है कि भारत को जगतगुरु की पदवी पर पुन: वापिस लाने हेतु आवश्यक है कि सभी एकजुट होकर परमात्मा के साक्षात्कार स्वरूप को जानें। उनके इसी आह्वान को साकार रूप देने के लिए संस्थान द्वारा समय-समय पर आध्यात्मिक कार्यक्रम किए जाते है। सर्वकल्याणमयी प्रक्रिया की इसी श्रृंखला के दौरान नूरमहल आश्रम में मासिक भंडारे का आयोजन किया गया। जिसका शुभारंभ मंच संचालन की प्रक्रिया से स्वामी विश्वानंद जी के द्वारा किया गया। सत्संग समागम के दौरान श्री आशुतोष महाराज जी कि शिष्या साधवी अक्षदा भारती जी ने गुरु-शिष्य के स्वार्थरहित प्रेम का व्यायान करते हुए बताया कि भक्ति के मार्ग पर प्रेम और समर्पण दोनों का होना आवश्यक है। प्रेम है तो शिष्य का समर्पण स्वत: ही हो जाता है । फिर वह तन,मन,धन से गुरु की सेवा करता है। वह सेवा में इस तरह से संलग्र हो जाता है कि उसके इस वेग को कोई भी रोक नहीं सकता। परिस्थितियाँ भी ऐसे शिष्यों के आगे नतमस्तक हो जाती हैं। फिर ऐसे शिष्य आध्यात्मिक पक्ष को मजबूत बना कर एक विवेकपूर्ण व्यक्तिव में उभरकर समाज का कल्याण करते हैं। इतिहास में ऐसे अनेक शिष्य हुए हैं जैसे स्वामी विवेकानंद जी, योगानंद जी इत्यादि इन सभी ने परमात्मा का साक्षातकार कर भक्ति मार्ग को दृढ़ता से पूर्ण किया तथा वास्तविक प्रेम का उदाहरण बन इतिहास के पन्नों पर अपना स्वर्णिम अक्षरों में नाम अंकित किया। इसके पश्चात स्वामी रणजीतानंद जी ने जीवन में पूर्ण गुरु की महिमा के संबंध में बताते हुए कहा कि कई बार हम किसी व्यक्ति से ऐसे मिलते हैं कि हम स्वयं को उसके समक्ष बिना किसी कारण के, बिना किसी उधेड़-बुन के ज्यों का त्यों छोड़ देते हैं और ऐसी विशेषता पूर्ण गुरु में ही हो सकती है। जिसके प्रभाव से सामने वाला बिना किसी निमंत्रण के खिंचा चला जाता है और स्वयं को पूर्ण समर्पित कर देता है। लेकिन गुरु के भीतर ऐसा 1या है जो उसे आम आदमी से अलग करता है। स्वामी जी ने बताया कि वह है गुरु का ज्ञान। गुरु वह शक्ति है, जिसका दर्शन बंद आँखों से भी चारों पहर बना रहता है। गुरु वह है जो इन्सान को अन्धकार से प्रकाश की, अज्ञान से ज्ञान की और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाता है।

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